क्योंकि मिलेनियल्स भी कभी जेन-झी थे… (थे ना?)
दौर बदला है, तरीक़े बदले है, अल्फ़ाज़ बदले है, पर तोशिस वही है।
“बड़े हमारी बात नहीं सुनते!”
देखो बात बस इतनीसी है, बोलना सब चाहते है, सुनना कोई नहीं चाहता।
ग़लती से कुछ सुन भी ले तो वह समझने के लिए नहीं, ज़वाब देने के लिए।
ऐसे संवाद नहीं हो पाता बस बेहेस होती है।
अगर आज हम ख़ुदको बड़ा बताते है, तो संवाद साधने की ज़िम्मेवारी हमारी है।
हम भी तो कभी छोटे थे, हम भी चाहते थे की हमारी बात बड़े सुन ले, कैसे भूल गए वो पल?
आज जेन-झी के पास विकल्प है, आप नहीं सुनेंगे तो कोई और सुनेगा।
फ़िर मत कहना की बच्चें हमसे ज़्यादा इंस्टाग्राम को अपने क़रीब मानते है।
अगर हम ये नहीं चाहते की बच्चे ग़लत सलाह माने, तो हमें बात करनी होगी।
बार बार कोशिश करनी होगी, तब तक जब तक बच्चें हमें अपना नहीं मानते।
और वह चाहते क्या है; आज़ादी और अवसर, बस और कुछ नहीं।
हम भी तो यही चाहते थे। तो बेहेस है किस बात की?
ऐसा तो नहीं की इस चुप्पी से उन्होंने किसी पक्ष को और अपने किसी पक्ष को अपना मान लिया?
जब की अपने तो केवल हम, आप और अपने बच्चें है, पक्ष तो ख़ैर…
हो सकता है हमनें दुनिया देखि हो, उन्होंने अभी पूरा शहर तक नहीं देखा।
हो सकता है हमनें क्या कुछ सहा हो, उन्होंने अभी कुछ नहीं सहा।
ये भी हो सकता है की हमनें अपनी इच्छा आकांक्षा अंदर ही अंदर दबा दी।
हो सकता है जेन-झी आपकी तरह खुद को कुचलना नहीं चाहते।
इसका मतलब ये नहीं की वो स्वार्थी, कृतघ्न है, शायद वो बस आग्रही है।
तो उन्हें रोको मत, खींचो मत, उनके निर्णय उन्हें लेने दो, बस निर्णयों की ज़िम्मेवारी लेना सिखाओ।
आधार बनो, सुरक्षा बनो, और दोस्त बनो, ताकी अगर आगे जाके गिर फ़िसल जाए तो अपने पास आए।
किसी ने हमें मिलेनियल बोल दिया और उन्हें जेन-झी, कोई अंधभक्त क़रार हुआ कोई ऐंटीनॅशनल।
और हमने मान भी लिया। क्यों?
इन आभूषणों को निकाल फेंकों, कोई चाहता है की बहस हो, तनाव हो, तो जरुरी नहीं है की हो।
अगर हम चाहें तो संवाद हो सकता है, शांति हो सकती है, ख़ुशी हो सकती है।
बस याद रखना, हम भी कभी जेन-झी थे।