First published on Facebook on 18th January 2022
दोपहर का वक़्त था, सड़क लगभग खली थी और घर जल्दी पहुँचने की कोई खास वजेह नहीं थी। अस्सी-नब्बे की स्पीड से गाड़ी चलाते हुए रेडियो पे चल रहे गानों का लुत्फ़ उठा रहा था। दो गानों के बीच में या तो विग्यापन होते है या कोई फ़िल्मी बातचीत, शायद ही कभी कोई ऐसी बात होती है जो आपका मन मोह ले। लेकिन इस सम्भाषण ने मेरा ध्यान पूरी तरह खिंच लिया।
एक श्रोता ने अपनी राय चिट्ठी द्वारा साझा की थी, उसने लिखा था;
“पहले के मुकाबले आज महिलाएं काफी ज्यादा सक्षम और स्वतंत्र है, वो अपना ख्याल खुद रख सकती है और अपने साथ अपने परिजनों का भी। बेटियां अब किसी की जिम्मेदारी नहीं है न किसी की जागीर, तो ऐसी स्थिति में कन्यादान जैसे सड़े-गले रीती रिवाजों का क्या मोल? बेटी कोई वस्तु नहीं है जो पिता किसी को भीख में दें।”
इस बात पर रेडियो संयोजक ने बड़ी सरलता से समझाया;
“रिवाज को या संस्कार को समझने से पहले शब्द को समझना जरुरी है। अक़्सर भीख या खैरात (चैरिटी) में हम वो चीज देते है, जो अपने पास जरूरत से अधिक होती है। जिसके देने से हमें कोई असुविधा नहीं होती। इसके विपरीत, दान उस बात का होता है जो अपने अस्तित्व का हिस्सा है, अपना अंग है, जिसे त्यागने में अपनी क्षति है। अपने कलेजे के टुकड़े को अपने से अलग करना, न भीख है न खैरात, ये महा-दान है और बड़े पुण्य का काम है। कन्यादान सृष्टि के जीवन चक्र की एक कड़ी है, निर्मोह कार्य है। सड़े-गले तो खैर अपने विचार है।”
पश्चिमी सभ्यता के नज़रिये से देखेंगे तो शायद हर चीज बेतुकी लगेगी, बेकार लगेगी। हर संस्कार अपनी जगह सही है, उसके पीछे विस्तृत सोच विचार है। जरुरी यह है की हम अपने हठ का चश्मा उतारे और ग़ौर से देखें, समझें।
प्राइवेट रेडियो स्टेशन के मुक़ाबले विविध भारती के सुनने वाले कितने है, ये तो मैं नहीं जनता, लेकिन जितने भी है, निसंदेह उन्हें बेहतर सोच और बेहतर मनोरंजन का लाभ मिलेगा।
देश की सुरीली धड़कन, विविध भारती।