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First published on Facebook on 30th March 2022

सुबह सवा-पांच बजे झाँसी स्टेशन, माफ़ कीजिये, वीरांगना लक्ष्मीबाई रेलवे जंक्शन पर राजधानी एक्सप्रेस पहुँच गई। होटल वालो ने टैक्सी भिजवाई थी, तो बहार खड़े उत्साही रिक्शा वालों से उलझने की नौबत नहीं आयी। पार्किंग में ड्राइवर भाईसाहब जुबान केसरी करने में लगे हुए थे। बिना कुछ बोले मेरे सामान को डिक्की में रख कर साहब ने गाड़ी का दरवाजा खोला। “क्या मैं आगे बैठ सकता हूँ?”, मैंने विनम्रता से पूछा। बड़ी कुशलता से जमाये केसरी रस को न चाहते हुए भी अपने मुँह से रिहा कर भाईसाहब बोले, “जैसी आपकी मर्जी।”

झाँसी शहेर अभी नींद से जगा नहीं था, स्टेशन इलाके की थोड़ी बहुत भीड़ के इलावा सड़कें खाली थी, मौसम भी अच्छा था। मेरे कहने पर ड्राइवरजी ने AC बंद कर खिडकियां खोल दी। निरंतर बजने वाले बजर से में थोड़ा परेशां हुआ, पता चला की सीट बेल्ट का बजर है। “पेहेन लो भाई”, मैंने ड्राइवर से कहा। भाईसाहब ने उत्तर-स्वरुप केवल केसरी रस को खुली खिड़की से बहार किया और गर्दन को झटका। इसका मतलब शायद, “अजी छोड़ो यार” या ऐसाही कुछ था।

इन दिनों यात्रा के दौरान टैक्सी ड्राइवर से बात करना फ़ैशन में है, बड़े बड़े अर्थशास्त्री, उद्योगपति इनकी राय जानना चाहते है। मैं बड़ा आदमी तो हूं नहीं पर यह अनुभव लेने के लिए में उत्सुक था, तो मैंने पहल की। “महाराज जी ने सपथ ग्रहण कर ली कल…”, मैंने थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा। भाईसाहब ने मेरी और देखा और केसरिया रस को अत्यंत उत्साह से अपने मुख से बाहर किया। मैं समझ गया की तीर निशाने पे लगा है। अपने ट्रेडमार्क गुलाबी गमछे से मुह पोछते हुए कहा, “होना ही था।”

विषय को बढ़ावा देते मैंने पूछा, “कैसा है प्रशासन बाबा का?”

“टेंसन फ्री सरकार है बस। और क्या बताएं।” फट से ड्राइवर बोले। हाईवे की और गाड़ी को मोड़ कर कहने लगे, “सर आप पहली बार आए है U.P?” मैंने अपनी पहली मथुरा यात्रा याद करते हुए कहा, “कई साल पहले आया था।” “तब तो आप ही बताइये कभी सपने में भी सोचा था परिवर्तन होगा?” भाईसाहब बोले। मैं बस मुस्कुराया, तब का आगरा से मथुरा- बृंदावन का भीड़ और कचरे से भरा रास्ता और आज का सफर, अंतर तो साफ़ दिखाई दे रहा था। ड्राइवर कहने लगे, “झाँसी से ओरछा महज पंधरा बीस किलोमीटर का रास्ता है, हाला की ओरछा मध्-प्रदेस में आता है लेकिन यहाँ बार्डर ऊपर निचे है। चुनिंदा टूरिस्ट आते थे पहले, कई लोग ओरछा को जानते तक नहीं पर आज यहाँ कन्भेन्सन सेण्टर बना है, आए दिन कंपनियों की मीटिंग चलती है, होटल बुक है, गाड़ी बुक है, गाइड बुक है, बताइये, टेंशन फ्री है के नहीं है?” मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “जी अच्छा है, रोजगार है तो अच्छा है।”. तुरंत भाईसाहब बोले, “अरे सर अच्छा नहीं बहुत अच्छा है। जैसे डबल इंजन बोलते है न, हमे तो ट्रिपल इंजन मिला है, समझ रहे है? सुना है अगले महीने बाबा और मामा जी दोनों आ रहे है हमारे ओरछा में।”

“होटल वाले यादवजी कह रहे थे कल आप खजुराहो जाएंगे। खजुराहो एकसौ पिचासी किलोमीटर है यहाँ से, बताइयें कितना समय लगेगा? ड्राइवर साहब ने पूछा। “यही कुछ चार पांच घंटे?” मैंने अंदाजा लगाया। ड्राइवर साहब सीना चौड़ा कर बोले, “ये देखिये, मिर्ज़ःपुर एक्सप्रेसवे, वेब-सीरीज तो देखी होगी आपने, वही वाला। गोली नहीं चलती, सब बकवास है, सिर्फ बुलडोजर चलता है। ढ़ाई घंटे में पहुंचा देंगे आपको, मनुमेंट देख के श्याम तक वापस आजायेंगे ओरछा। ठीक है ना?”

हाईवे छोड़ गाड़ी ओरछा के प्रवेश द्वार से अंदर निकल पड़ी। सुबह हो रही थी, बच्चे, जवान और बूढ़े सड़क पर चल, दौड़ रहे थे, कसरत कर रहे थे, मौसम बढ़िया था। गणेश द्वार से प्रवेश कर, राजा-राम जी के मंदिर से होकर गाड़ी होटल तक पहुँच गयी। भाईसाहब सामान निकाल कर रिसेप्शन ले आए। “बुंदेलों की प्राचीन नगरी ओरछा में आपका स्वागत है”, होटल मैनेजर यादवजीने स्वागत से कहा। ड्राइवर साहब जाते हुए बोले, “कल दिखाएंगे आपको परिवर्तन हाईवे, जय राम जी की” मुस्कुराते हुए मैंने कहा, “राम जी की जय।”

भाई परिवर्तन तो हुआ है।

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